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काम, क्रोध, मोह व लोभ मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु: नवीन चन्द्र कहा: कामवासना ने ही लंकापति रावण को मृत्यु तक पहुंचाया

ABSLM  -9/8/85023 एस• के• मित्तल 

सफीदों,      नगर की श्री एसएस जैन स्थानक में धर्मसभा को संंबोधित करते हुए संघशास्ता शासन प्रभावक सुदर्शन लाल महाराज के सुशिष्य संघ संचालक नरेश चंद्र महाराज के आज्ञानुवर्ति मधुरवक्ता नवीन चंद्र महाराज तथा सरलमना श्रीपाल मुनि महाराज ने कहा कि काम, क्रोध, मोह व लोभ मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु है। पांच कषायों के चंगुल में फंसकर मानव अपने लोक और परलोक को नारकीय बना रहा है। मानव योनी 84 लाख जीवों की गति के बाद मिलती है। इस धरा पर मानव ही प्रभु की भक्ति करके मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।  उन्होंने कहा कि कामवासना से ग्रस्त व्यक्ति समाज में रहने के लायक नहीं है। इस प्रकार के लोग मां को मां और बहन को बहन नहीं समझते। अक्सर कहा जाता है कि उल्लू को रात में नहीं दिखता लेकिन कामवासना से ग्रसित व्यक्ति को ना तो रात और ना ही दिन में दिखता है। कामवासना जब आदमी के सिर पर हावी होती है तो आदमी को सही और गलत की पहचान नहीं रहती। लंका के राजा रावण को उसकी कामवासना मारा। उसके मन में लालसा हुई कि उसके महल में सीता उसकी पत्नी के रूप में होनी चाहिए। उसकी इसकी आकांक्षा ने उसके पूरे कुल व लंका नगरी का विनाश कर दिया। लंकेश को उसकी पटरानी मंदोदरी, भाईयों, रिश्तेदारों समेत उसके अनेक हितचिंतकों ने काफी समझाया कि जो आप कर रहे हैं और वह गलत हैं और आप सीता को आदर सहित वापिस लौटा दें। इसी में आपकी, लंका, कुल व प्रजा की भलाई है लेकिन रावण के कुछ भी समझ में नहीं आया क्योंकि उसके दिल और दीमाग पर कामवासना हावी थी। लंकापति रावण स्वयं अपने आप में बहुत बड़ा विद्वान था और किसी साधु ने उनको पहले से ही बता दिया था कि वह पराई नार से बचकर रहे क्यों कि उसकी मृत्यु किसी पराई औरत के कारण होगी। इंसान कितना भी बड़ा क्यों ना हो जाए, उसकी इच्छाएं व तृष्णाएं खत्म नहीं होती। उन्ही इच्छाओं व तृष्णाओं ने महाबलि रावण को मौत के घाट पहुंचाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को कामवासना त्यागकर आत्मशुद्धि की तरफ ध्यान देना चाहिए। मनुष्य कामवासना को सुखों का सागर समझ रहा है, यह उसकी भयंकर भूल है। संसार के लोगों को पांच कषायों को छोड़कर आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आगे बढऩा होगा। आत्मा के ज्ञान को समझकर गुरुओं की आज्ञा को स्वीकार करना चाहिए। विनय व भावना के बल पर मनुष्य सबकुछ प्राप्त कर सकता है। भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और तप मानव को संसार रूपी भव सागर से पार लगा सकते हैं।

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